खुदा खैर करे खुदरा का
इसे महज राजनीतिक पैंतरेबाजी मानिए कि भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा संसद में खुदरा कारोबार पर विदेशी निवेश की अनुमति से आहत होकर स्थगन प्रस्ताव लाने जा रही है. भाजपा की इस पहल को जनहित के पक्ष में उठाया गया कदम न मानने के पीछे ठोस कारण है. यह भारतीय जनता पार्टी ही है जिसके शासनकाल में केन्द्र सरकार की ओर से एक प्रस्ताव तैयार किया गया था और समझाया गया था कि कैसे खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश बहुत जरूरी है. प्रस्ताव भी किसी सरकारी एजंसी ने तैयार नहीं किया था बल्कि एक निजी सलाहकार कंपनी मैकन्जी ने यह प्रस्ताव तैयार किया था जिस पर तत्कालीन एनडीए सरकार ने अपनी सहमति का ठप्पा लगा दिया था.
इसलिए आज अगर यूपीए सरकार खुदरा कारोबार में 51 फीसदी विदेशी निवेश की अनुमति दे रही है तो वह उस ठप्पे की स्याही को ही ताजा कर रही है. नीतिगत फैसला एनडीए सरकार के दौरान ही हो गया था, उसे अमलीजामा अब यूपीए सरकार पहना रही है. जो लोग पिछले बीस बाइस सालों से जारी अतार्किक आर्थिक गतिविधियों को देख समझ रहे हैं उनके लिए यह कोई आश्चर्यजन निर्णय नहीं है. राजीव गांधी के समय में जिस नयी अर्थव्यवस्था की खोजबीन पर काम शुरू हुआ था और नरसिंहराव के समय जिसकी विधिवत शुरूआत हुई थी यह उसी सोच का विस्तार भर है. जो विदेशी कंपनियां भारत में आर्थिक उदारीकरण को आर्थिक नवजागरण कहकर प्रचारित कर रही थीं, अगर उनको पूंजी कमाने का मौका नहीं मिलेगा तो फिर भला इस उदारीकरण से किसका भला होगा? इसलिए सवाल कैबिनेट के फैसले से ज्यादा सरकारी व्यवस्था, नागरिक उत्तरदायित्व और भारतीय बाजार व्यवस्था की सुरक्षा को लेकर है. कैबिनेट ने अगर यह प्रस्ताव पारित किया है तो ऐसा नहीं है कि उसे मालूम नहीं है कि इस फैसले से क्या राजनीतिक बवंडर पैदा होगा फिर भी फैसला हुआ है तो जरूर उसके पीछे बड़ी कंपनियों का बहुत बड़ा दबाव और दूरगामी रणनीति है.
पूरी दुनिया में खुदरा कारोबार व्यापार की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है. उत्पादन और उपभोक्ता के बीच जनता व्यापारी के रूप में जहां भागीदार होती है वह खुदरा कारोबार ही होता है. यूरोपीय सभ्यता के गर्भ से निकले औद्योगीकरण ने उत्पादन को भीमकाय बनाते हुए छोटी छोटी जरूरतों को भी बड़ी बड़ी फैक्ट्रियों का मोहताज बना दिया. भारत या फिर दुनिया की परंपरागत गृहस्थ अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इस अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता और उत्पादक दो अलग अलग प्रजातियां नहीं हुआ करती हैं. जिसे हम ग्रामीण अर्थव्यवस्था के रूप में जानते हैं असल में गृहस्थ अर्थव्यवस्था है जिसमें एक छोटी ईकाई ग्राम के अनुसार उत्पादन और वितरण की समानुपातिक व्यवस्था चलती है. एक ग्राम की जरूरतें और उन जरूरतों के लिहाज से उत्पादन और उपभोक्ता का विभाजन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार है. लेकिन यूरोप ने जिस औद्योगिक सभ्यता को आधुनिकता कहा उसमें उपभोक्ता एक अलग प्रजाति होती है और उत्पादक एक अलग प्रजाति. नयी औद्योगिक व्यवस्था में उत्पादक अपेक्षाकृत कम जबकि उपभोक्ता समूची मानव जाति हो सकती है. इसका चरम यह होगा कि दुनिया की कुल आबादी की समस्त जरूरतों को अगर एक ही कंपनी पूरी करने लगे तो माना जाएगा कि औद्योगीकरण अपने सफलत स्वरूप में सामने आ गया है. क्योंकि औद्योगीकरण अपने चरम पर पहुंचकर अमानवीय हो जाता है इसलिए इसके शिखर पर पहुंचने से पहले मानव समाज द्वारा लगातार विरोध होता रहता है.
इसलिए जैसे ही भारत के खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश की बात शुरू हुई सहज रूप से भारत में इसका विरोध शुरू हो गया. बीस साल के भारतीय उदारीकण में भारत को जिन आशंकाओं से घेरा गया था, क्या वे सब सही साबित हुई हैं? अब हम कोई विस्तृत और खर्चीला अध्ययन करके ही यह जान पायेंगे कि असल में उदारीकरण से भारत को नुकसान क्या हुआ है? नहीं तो हमें तो यह भी पता नहीं है कि भारत के समाजवादी दौर में जिन उत्पादों पर विदेशी कंपनियों द्वारा उत्पादन या निर्यात पर प्रतिबंध लगाया गया था उसे सात आठ साल पहले ही खत्म कर दिया गया है. ऐसे उत्पाद कोई दो चार सौ नहीं बल्कि पूरे पंद्रह हजार थे जिन पर विदेशी कंपनियों द्वारा उत्पादन या निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध था. जिन दिनों आर्थिक उदारीकरण के वशीभूत होकर ये मात्रात्मक प्रतिबंध हटाये जा रहे थे उन दिनों हमने यह चिंता नहीं कि आखिर यह रास्ता किसलिए बनाया जा रहा है? उत्पादन या आयात को प्रतिबंध से मुक्त करने का मतलब ही यही था कि वे विदेशी ब्रांड जो अभी भारत नहीं लाये जा सकते थे या यहां विदेशी कंपनियां नहीं बना सकती थीं अब वे भारत में लाये भी जा सकते हैं और बनाये भी जा सकते हैं. इस सूची में ज्यादातर ऐसे उत्पाद थे जो छोटे उद्योग समूहों या कुटीर उद्योग द्वारा बनाये जाते हैं. इसलिए आखिरी बार अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने मात्रात्मक प्रतिबंधों को समय से पहले समाप्त कर दिया तो उन खुदरा कारोबारियों को भारत आने का मौका मिल गया जो मल्टीब्रांड रिटेल के क्षेत्र में बड़े नाम हैं. वर्तमान कैबिनेट की मंजूरी उसी कड़ी में एक और सहमति भर है.
दुनिया में खुदरा कारोबार का स्वरूप कैसा है इसे वे जाने जो दुनिया घूमते हैं पिछले कुछ सालों में अपने यहां भी कुछ औद्योगिक समूहों ने खुदरा कारोबार में हाथ आजमाया है. पिछले तीन चार साल का अगर हम उनका अनुभव देंखे तो कह सकते हैं कि अभी तक तो उन्होंने अपना हाथ जलाया ही है. रिलायंस फ्रेश बासी कढ़ी साबित हुआ है और सब्जी भाजी के कारोबार की बजाय उसने कपड़े लत्ते बेचना ज्यादा अच्छा काम समझा. रिलायंस समूह ने रिलायंस फ्रेश की बजाय रिलायंस डिजिटल के स्टोर ज्यादा खोले हैं और सफल भी रहे हैं. इसी तरह भारी भरकम प्रचार अभियान के साथ शुरू हुआ सुभिच्छा स्टोर किराया भी नहीं निकाल पाया और बंद हो गया. साफ है जिन कंपनियों ने भारत में वालमार्ट की तर्ज पर सर्वसामान बेचने की दुकान खोली वे धराशायी हो गये लेकिन जिन्होंने फैशन और टेक्नालाजी के फील्ड में हाथ आजमाया वे सफल रहे. फिर अगर ऐसा है तो सरकार के इस फैसले से इतना परेशान होने की जरूरत क्यों है?
असल में इस फैसले का असर अभी न तो खास होनेवाला है और न ही कोई ऐसी बड़ी मार भारतीय दुकानदारों पर पड़ने जा रही है जिसका डर दिखाया जा रहा है, लेकिन इसका परिणाम दूरगामी होगा. बदलते भारतीय समाज में जिस तरह से शहरों को शह मिल रही है उसे देखते हुए हम कह सकते हैं कि अगले एक दो दशक में हमारी आधी से अधिक शहरों में रह रही होगी. इसमें भी बड़े शहरों पर आबादी का बोझ सबसे अधिक होगा. तब हमारी आबादी शायद डेढ़ सौ करोड़ होगी. अब आप सोचिए जिस देश की पचहत्तर अस्सी करोड़ आबादी सिर्फ चंद शहरों में सिमट जाए वहां खुदरा कारोबारियों के कितना सुनहरा मौका होगा? आज हमारे देश में जो शहर बसाये जा रहे हैं वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पूरक नहीं है. हमारे शहर स्वतंत्र ईकाई हैं जिसकी सिर्फ जरूरतें हैं, आपूर्ति करने की क्षमता कुछ भी नहीं है. ऐसे में इन शहरों को भोजन, पानी, कपड़ा और उनकी जरूरत का सामान क्या आज का खुदरा बाजार मुहैया करा पायेगा? जो लोग नये बसते शहरों को नहीं देख पाये हैं वे जाकर देंखें तो उन्हें खुद समझ में आ जाएगा कि नये शहरों से पुराने बाजारों को उसकी बसावट में ही शामिल नहीं किया गया है. नये शहर माल्स और हाइपर मार्केट के शहर हैं. और जहां माल्स और हाइपर मार्केट होंगे तथा रेहड़ी पर सब्जी बेचने को कानूनी जुर्म समझा जाएगा वहां खुदरा कारोबारी आपूर्ति नहीं करेंगे तो कौन करेगा?
खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश पर हो हल्ला चाहे जितना मचे आज मंत्रिमंडल ने मंजूरी दी है थोड़े समय बाद संसद अपनी मंजूरी दे देगा. जैसे उदारीकरण के नुकसान को आंकने निकले तो शायद हम खाली हाथ लौट आये वैसे ही खुदरा कारोबार के जो संभावित नुकसान बताये जा रहे हैं वे जब वास्तव में घटित होंगे तो उसे जान पाने की कोई विद्या हमारे पास नहीं होगी. ऐसे आर्थिक बदलाव सामाजिक और मानसिक बदलाव भी लाते हैं इसलिए आज जो विरोध करनेवाला मानस है कल न तो वह मानस रहेगा और न ही वह समाज. फिर भी, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश का समर्थन कर दिया जाना चाहिए. हां, इतना जरूर है कि उसके खतरे वे नहीं हैं जो बताये जा रहे हैं. खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश भारतीय मध्यवर्ग को उस बाजार का अनुभव कराएगा जिसे अनुभव करने के लिए यह मध्यवर्ग अभी अमेरिका से लेकर दुबई तक के चक्कर काटता रहता है. अभी से तो यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि कौन फायदे में रहेगा और कौन घाटे में जाएगा. फिर भी इतना तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि खुदरा कारोबार का वह स्वरूप भविष्य में बिल्कुल ही नहीं बचेगा जिसके भरोसे आज हम अपनी जिंदगी चलाते हैं.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें